Tuesday, December 2, 2008

मुक्तक 23

कुआँ ही खोद न पाओ तो फिर गिला कैसा?
ग़लत कहा कि 'ज़मीनों में जल नहीं मिलता'
इक इंतज़ार का अर्सा भी दरमियान में है
किसी को पेड़ लगाते ही फल नहीं मिलता

समय है लू का तो पुरवाइयों का मौसम भी
पवन झुलस गई शाखें निखार आती है
बताओ डालियाँ पतझर से हारती कब हैं?
बहार आती है और बार-बार आती है

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

7 comments:

अशोक मधुप said...

बहुत अच्छे मुकतक।

bahadur patel said...

bahut achchha hai.

संजीव तिवारी said...

बढिया मुक्‍तक, आभार ।


सापेक्ष के सपने सच होनें लगे हैं

संजीव तिवारी said...

सापेक्ष के सपने सच होनें लगे हैं

Santhosh said...

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Jai..HO....

Murari Pareek said...

विजय दशमी की आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभ कामनाए !!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सुंदर भाव।