Friday, November 14, 2008

मुक्तक 17

वह युग जो जा चुका है, उसे मत भुलाइए
अच्छाइयाँ बहुत थीं, पुराने के साथ भी
दुनिया से अपनी दूरियाँ, पहले मिटाइए
हम अपने साथ भी हैं, ज़माने के साथ भी

भूल किसकी थी कि जानें आँकड़ों में ढल गई
आदमी अब आदमी कब रह गया, गिनती बना
शक्ति थी बाहों में जब तक हाथ फैलाए नहीं
कर्म ने जब हार मानी, क्या बना? विनती बना

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Thursday, November 13, 2008

मुक्तक 16

विश्व के निर्माण को निर्माणकारी चाहिए
कौन मूरख सीख यह देता है, दुनिया कुछ नहीं
शिल्पियों ने छू दिया तो देवता बन जाएगा
तेरे-मेरे हाथ में पत्थर का टुकड़ा कुछ नहीं

यों तो ऐ दुनिया सभी कुछ है तेरे बाज़ार में
दुख भी है, आराम भी है, मान भी अपमान भी
देखना यह है कि किसने किस तरह से तय किया
ज़िंदगी का रास्ता मुश्किल भी है आसान भी

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Wednesday, November 12, 2008

मुक्तक 15

आस्माँ मैला हुआ, पानी हवा दूषित हुए
मिटि्टयों में ज़हर ऐसा क्या कभी पहले भी था
रिश्ते नाते वह नहीं हैं जिनको सुनते आए हैं
आदमी जो आज है वह आदमी पहले भी था

रात कटनी चाहिए, सूरज निकलना चाहिए
रोशनी आ जाएगी घर में दरीचा हो न हो
तुम निरालेपन की धुन में क्यों लगे हो दोस्तो!
काम हो अच्छे से अच्छा, वह अनोखा हो न हो

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Tuesday, November 11, 2008

मुक्तक 14

अगर चिराग़ जलाने का होश बाकी है
अमावसों के अँधेरे से कुछ नहीं होता
अमल नहीं है तो कुछ भी नहीं है दुनिया में
विचार और इरादे से कुछ नहीं होता

माने कोई जो सच तो उसे आइना दिखा
भटका हो गर पथिक तो उसे रास्ता दिखा
बिखरे हुए हैं चारों दिशा में हज़ार भ्रम
आँखों को देखना नहीं, पहचानना सिखा

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Monday, November 10, 2008

मुक्तक 13

कब हवा-जल के बिना फूल खिला करते हैं
कब बुझे दीप पे परवाने जला करते हैं
कोई दुनिया में किसी का नहीं बनता यों ही
लोग अपने तो बनाने से बना करते हैं

शोर बढ़ता जा रहा है शहर के माहौल में
मौन अपना तोड़ लेकिन गीत बन, नारा न बन
आस्माँ में जोत की रेखा बना, पर जल बुझा
दीप-माला बन के जी, टूटा हुआ तारा न बन

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Sunday, November 9, 2008

मुक्तक 12

मिट न पाई आदमी से आदमी की दूरियाँ
सब घरों में एक जैसी जिंदगी पहुँची नहीं
बल्ब घर का ऑन करके देखिए, फिर सोचिए
कौन से कोने हैं, जिनमें रोशनी पहँची नहीं

मेघ पहले भी तेरे वश में न थे, अब भी नहीं
यदि कुआँ खोदा नहीं, पानी की आशा किसलिए
द्वार मन का बंद हो तो प्यार की खुशबू कहाँ
सीप को खोले बिना, मोती की आशा किसलिए

घर बंद अगर है तो सुगंधित नहीं होगा
खुशबुएँ हवा में कभी रुकने नहीं पातीं
फल चाहिए तो फिर हाथ बढ़ाना है ज़रूरी
शाखाएँ तो माली कभी झुकने नहीं आतीं

आप देखें किसको पाने की लगन है आपमें
ओस का कतरा भी है, बहता हुआ दरिया भी है
देखना यह है कि क्या बोया है, हमने आपने
कोख में धरती की मीठा फल भी है कड़ुआ भी है

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Saturday, November 8, 2008

मुक्तक 11

जल से जूझे नहीं जो खेवनहार
तट पे जलयान जा नहीं सकता
हाथ जब तक नहीं बढ़ाओगे
जाम खुद चल के आ नहीं सकता

क्या सफर तय करेंगे जीवन का
वे जो गिर कर सँभल नहीं जाते
आग दुख की हमें न बदलेगी
जल के रस्सी के बल नहीं जाते

जो फसल काटने के इच्छुक हैं
याद रखते हैं खेत बोना भी
खोजने के हुनर पे है निर्भर-!
शूल मिट्टी में है तो सोना भी

हर तरफ़ महनतों की रौनक है
हम समझते हैं, टाल देते हैं
चलते-चलते ज़मीं की छाती पर
पाँव रेखाएँ डाल देते हैं

डा गिरिराजशरण अग्रवाल