Saturday, November 8, 2008

मुक्तक 11

जल से जूझे नहीं जो खेवनहार
तट पे जलयान जा नहीं सकता
हाथ जब तक नहीं बढ़ाओगे
जाम खुद चल के आ नहीं सकता

क्या सफर तय करेंगे जीवन का
वे जो गिर कर सँभल नहीं जाते
आग दुख की हमें न बदलेगी
जल के रस्सी के बल नहीं जाते

जो फसल काटने के इच्छुक हैं
याद रखते हैं खेत बोना भी
खोजने के हुनर पे है निर्भर-!
शूल मिट्टी में है तो सोना भी

हर तरफ़ महनतों की रौनक है
हम समझते हैं, टाल देते हैं
चलते-चलते ज़मीं की छाती पर
पाँव रेखाएँ डाल देते हैं

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Thursday, November 6, 2008

मुक्तक 10

आदमी कठिनाइयों में जी न ले तो बात है
ज़िंदगी हर घाव अपना सी न ले तो बात है
एक उँगली भर की बाती और पर्वत जैसी रात
सुब्ह तक यह कालिमा को पी न ले तो बात है

पेड़ हैं लचकेंगे, फिर सीधे खड़े हो जाएँगे
नाचते गाते रहेंगे, आँधियों के दरमियाँ
आपदाओं से कहाँ धूमिल हुई जीवन की जोत
फूल खिलते आ रहे हैं कंटकों के दरमियाँ

शब्द भी मेरे नहीं हैं, गीत भी मेरे नहीं
मैंने जो कागज पे लिक्खा वह सभी का हो तो हो
सर के ऊपर चाँद-सूरज, साँस में ढलती हवा
अंत जीवन का नहीं है, आदमी का हो तो हो

आचरण में मोम की नर्मी भी हो, फौलाद भी
फूल बनकर म्यान में तलवार रहना चाहिए
कब समय की माँग क्या हो, यह पता चलता नहीं
आदमी को हर घड़ी तैयार रहना चाहिए

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Wednesday, November 5, 2008

मुक्तक 9

एक ही पूँजी है ऐसी जो गई तो सब गया
जो भी है खो दीजिए, मानवता मत खोइए
रूप में पत्थर के ढलता जा रहा है आदमी
धन को पाने के लिए संवेदना मत खोइए

नाम चाहा न कभी भूल के शोहरत माँगी
हमने हर हाल में खुश रहने की आदत माँगी
हो न हिम्मत तो है बेकार यह दौलत ताक़त
हमने भगवान से माँगी है तो हिम्मत माँगी

जिन्हें तय करके आए हो, उन्हीं सड़कों पे मत लौटो
नई राहें निराले रास्ते सोचो तो अच्छा है
पुराने मौसमों की याद में खोए हुए क्यों हो?
जो मौसम आने वाला है, उसे सोचो तो अच्छा है

इस तरह बढ़-चढ़ के क्यों चर्चा अमावस की करें
रात काली ही सही, पर रोशनी थोड़ी नहीं
ज़िंदगी को चार दिन की मानने वालो सुनो
गर न भटकन में कटे तो ज़िंदगी थोड़ी नहीं


गिरिराजशरण अग्रवाल

Tuesday, November 4, 2008

मुक्तक 8

यदि कभी अवसर मिले, दोनों का अंतर सोचना
दर्द सहना वीरता है, जुल्म सहना पाप है
स्वप्न में भी सावधानी शर्त है, जीना जो हो
जागती आँखें लिए निंद्रा में रहना पाप है

सुख अगर बाँटें हैं तुमने आओ दुख भी बाँट लो
मेरे मन की पीड़ बस मेरी हो, सबकी क्यों न हो
अपनी अपनी नाक तक ही देखने का लाभ क्या?
आँख में हो जोत तो फिर दूरदर्शी क्यों न हो

बिजलियाँ कैसे बनी हैं बादलों से पूछिए
है समंदर का पता क्या बारिशों से पूछिए
छेद कितने कर दिए हैं रात के आकार में
दीपकों की नन्ही-नन्ही उँगलियों से पूछिए

कोई मसला सोचते रहने से हल होता नहीं
सामने का सच है जीवन, यह कोई सपना नहीं
अस्त्र से भी बढ़ के अपने पर भरोसा चाहिए
मौज से लड़ता है माँझी का हुनर, नौका नहीं

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

Monday, November 3, 2008

मुक्तक 7

शांत मुस्कानें अधर पर फैलती खिलती रहें
घर में बस धन ही नहीं हो, प्यार का सागर भी हो
मन के भीतर भी अँधेरे रास्त है हर तरफ़!
रोशनी बाहर नहीं इंसान के भीतर भी हो


नन्हा पौधा रोपकर साये की आशा किसलिए
फल जो दे, छाया भी दे, वह पेड़ बोना चाहिए
सुब्ह कल की शुभ न होगी, पहले यह शंका हटे
मन से कल का भय जो है, वह दूर होना चाहिए

मोह को घर-बार के मत साथ में लेकर चलो
यात्रा से जब भी लौटोगे तो घर आ जाएगा
सिर्फ साहस ही नहीं, धीरज भी तो दरकार है
सीढि़याँ चढ़ते रहो, अंतिम शिखर आ जाएगा

हर दिशा से तीर बरसे, घाव भी लगते रहे
जिंदगी भर दिल मेरा आघात से लड़ता रहा
दोस्त! कस बल की नहीं, यह हौसले की बात है
कितना छोटा था दिया, पर रात से लड़ता रहा

Sunday, November 2, 2008

मुक्तक 7

ढूँढ़ना कोई अगर चाहे दिशाएँ कम नहीं
खिड़कियों को खोलकर रक्खो, हवाएँ कम नहीं
एक ज्ञानी, क्या पते की बात मुझसे कह गया
भावना गर मन में हों, सँभावनाएँ कम नहीं

ओस आँसू की तरह कब तक गिरेगी देखना
फूल बनकर हर कली हँसने लगेगी देखना
सब के दिल में तो छुपी बैठी नहीं है कालिमा
रोशनी पत्थर के दिल में भी मिलेगी देखना

बंजरों में जल मिलेगा, प्यास तो बाकी रहे
दिल के अंदर दर्द का एहसास तो बाकी रहे
किसलिए बे-आस होकर राह तकना छोड़ दूँ
कोई आए या न आए, आस तो बाकी रहे

नफ़रत को नहीं, प्यार को ताक़त समझो
दुख पाओ जो रस्ते मंे तो राहत समझो
इक बार के गिरने से हताशा क्यों हो
ठोकर को सफलता की ज़मानत समझो

जिनको पानी है सफलता, जिनको करना है सफर
ठोकरें खाते हैं पर हटते नहीं हैं राह से
अंकुरित होता है पौधा दोस्त धरती चीरकर
कितना कोमल है, मगर भरपूर है उत्साह से

Saturday, November 1, 2008

मुक्तक 5

बाधाओं से लड़ती है बराबर दुनिया
संघर्ष से छू लेती है अंबर दुनिया
तुम भूल के यह शाख न कटने देना
इस शाख पे आशा की है निर्भर दुनिया

सावन को पुकारूँ तो घटनाएँ फैलें
लूँ साँस तो हर ओर हवाएँ फैलें
संसार मेरे वक्ष में सिमटे सारा
उत्साह में गर मेरी भुजाएँ फैलें

रोकेगा कहाँ पाँव यह पत्थर मेरा
चलता है तो रुकता नहीं लश्कर मेरा
मैं ओस की इक बूँद नहीं हूँ लोगो!
हर बूँद के अंदर है समंदर मेरा

इंसान हूँ अमृत का प्याला मैं हूँ
धुन कोई भी हो, गूँजने वाला मैं हूँ
सूरज जो छुपा, बढ़ के अँधेरा लपका
दीपक ने कहा देख उजाला मैं हूँ